top of page

सलीम अली (1896–1987): भारत के पक्षी पुरुष, जिन्होंने देश को प्रकृति का अवलोकन करना, समझना और उसकी रक्षा करना सिखाया

6 मिनट पहले
9 मिनट पठन

एक जिज्ञासु बालक से विश्व के सर्वाधिक सम्मानित पक्षी-विज्ञानियों में से एक बनने तक की यात्रा। सलीम अली ने भारत में पक्षियों के अध्ययन को नई दिशा दी और अनेक पीढ़ियों को वन्यजीवों के वैज्ञानिक एवं पारिस्थितिक महत्त्व को समझने के लिए प्रेरित किया।भारत की प्राकृतिक विरासत अत्यंत समृद्ध है, लेकिन जैव विविधता को समझने के लिए केवल प्रकृति की सुंदरता की प्रशंसा करना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए व्यवस्थित अवलोकन, वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण, धैर्य और प्राकृतिक संसार को जानने-समझने की सतत जिज्ञासा आवश्यक है। भारत में इस दृष्टिकोण को विकसित करने में जिन व्यक्तित्वों का सबसे अधिक योगदान रहा, उनमें डॉ. सलीम मोइज़ुद्दीन अब्दुल अली (1896–1987) का नाम प्रमुख है। वे लोकप्रिय रूप से 'भारत के पक्षी पुरुष' (Birdman of India) के नाम से जाने जाते हैं।

सलीम अली भारत के सर्वाधिक प्रभावशाली पक्षी-विज्ञानियों और प्रकृतिविदों में से एक थे। व्यापक क्षेत्रीय सर्वेक्षणों, वैज्ञानिक प्रकाशनों और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) के साथ अपने लंबे जुड़ाव के माध्यम से उन्होंने भारत में पक्षियों के अध्ययन को वन्यजीव अनुसंधान के एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में विकसित किया। उनका कार्य केवल पक्षियों की पहचान तक सीमित नहीं था; उन्होंने उनके वितरण, व्यवहार, प्रजनन प्रतिरूप, आवास और मौसमी प्रवास का भी अध्ययन किया। वे इस बात को भी समझते थे कि पक्षियों से संबंधित वैज्ञानिक ज्ञान का अंतिम उद्देश्य उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा और प्रकृति का संरक्षण होना चाहिए।[1–3]

उनका जीवन इस बात का प्रेरणादायक उदाहरण है कि किस प्रकार बचपन की जिज्ञासा, वैज्ञानिक अनुशासन और जनभागीदारी मिलकर समाज के लिए एक स्थायी योगदान का आधार बन सकते हैं।

प्रारंभिक जीवन: बचपन की एक घटना, जिसने सब कुछ बदल दिया

सलीम अली का जन्म 12 नवंबर 1896 को बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) में हुआ था। बचपन में ही उनके माता-पिता का निधन हो गया था। उनका पालन-पोषण उनके मामा अमीरुद्दीन तैयबजी ने किया। उनके परिवार का वातावरण बाहरी गतिविधियों और प्राकृतिक इतिहास में रुचि को प्रोत्साहित करने वाला था।[1,4]

उनके जीवन का निर्णायक क्षण तब आया, जब वे लगभग दस वर्ष के थे। अपने मामा द्वारा दी गई एयरगन से खेलते समय उन्होंने एक छोटी-सी चिड़िया को मार गिराया। वह देखने में सामान्य गौरैया जैसी थी, लेकिन उसके गले पर एक असामान्य पीला धब्बा था। इस अंतर को देखकर बालक सलीम के मन में जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि आखिर यह किस प्रजाति की चिड़िया है।

उनके मामा उन्हें बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी ले गए, जहाँ उनकी मुलाकात सोसाइटी के मानद सचिव डब्ल्यू. एस. मिलार्ड से हुई। मिलार्ड ने उस पक्षी की पहचान 'येलो-थ्रोटेड स्पैरो' (पीले गले वाली गौरैया) के रूप में की और बालक सलीम को सोसाइटी में संरक्षित पक्षियों के अद्भुत संग्रह से परिचित कराया। उन्होंने सलीम की प्राकृतिक इतिहास में रुचि को भी प्रोत्साहित किया।[1]

देखने में साधारण लगने वाली यह घटना एक असाधारण वैज्ञानिक यात्रा का प्रारंभ बन गई।

यह याद रखना महत्त्वपूर्ण है कि सलीम अली की पक्षियों में रुचि की शुरुआत एक पक्षी को गोली मारने की घटना से हुई थी, जो उस समय के पारिवारिक परिवेश में प्रचलित शिकार-संस्कृति को दर्शाती है। लेकिन समय के साथ पक्षियों के प्रति उनका संबंध पूरी तरह बदल गया। वे नमूने एकत्र करने से आगे बढ़कर पक्षियों को उनके प्राकृतिक परिवेश में जीवित अवस्था में देखने और समझने लगे। उनकी आत्मकथा The Fall of a Sparrow (1985) में इस प्रारंभिक यात्रा का वर्णन मिलता है।[4]

अनिश्चित करियर से व्यावसायिक पक्षी-विज्ञान तक

एक पेशेवर वैज्ञानिक बनने की दिशा में सलीम अली का मार्ग आसान नहीं था। उन्होंने बॉम्बे के सेंट जेवियर्स कॉलेज में पढ़ाई की, लेकिन उस समय के अकादमिक वैज्ञानिकों से अपेक्षित पारंपरिक विश्वविद्यालयी डिग्री पूरी नहीं की। परिवार के खनन और लकड़ी के व्यवसाय से जुड़ी बर्मा की एक असफल अवधि के बाद वे भारत लौट आए। अब उनका संकल्प पक्षियों के अध्ययन को ही अपना कार्यक्षेत्र बनाने का था।[1]

वर्ष 1926 में उन्हें बॉम्बे के प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूजियम के प्राकृतिक इतिहास विभाग में गाइड लेक्चरर का पद मिला। विशेषीकृत वैज्ञानिक प्रशिक्षण की आवश्यकता को समझते हुए वे जर्मनी गए, जहाँ उन्होंने बर्लिन जूलॉजिकल म्यूजियम में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक प्रोफेसर एर्विन स्ट्रेसमैन के मार्गदर्शन में पक्षी-विज्ञान का अध्ययन किया।[1,2]

इस प्रशिक्षण के बावजूद भारत में उनके लिए व्यावसायिक अवसर सीमित रहे। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (Zoological Survey of India) में पक्षी-विज्ञान से संबंधित पद के लिए उनका आवेदन सफल नहीं हुआ। इसका एक कारण उस पद के लिए अपेक्षित उच्च शैक्षणिक योग्यताओं का उनके पास न होना था।

अपनी महत्वाकांक्षा छोड़ने के बजाय सलीम अली ने एक महत्त्वपूर्ण अवसर पहचाना। उन्हें महसूस हुआ कि भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े भूभागों, विशेषकर तत्कालीन रियासतों में पक्षियों की विविधता का पर्याप्त सर्वेक्षण नहीं हुआ था।

उन्होंने व्यवस्थित क्षेत्रीय पक्षी सर्वेक्षणों का प्रस्ताव रखा। इनमें से अनेक सर्वेक्षणों को रियासतों से आर्थिक सहायता मिली। इस अभिनव दृष्टिकोण ने उन्हें क्षेत्रीय अनुसंधान करने का अवसर दिया और साथ ही भारत के पक्षी जगत के बारे में मूल्यवान वैज्ञानिक जानकारी भी उपलब्ध कराई।[1,2]

उनका करियर एक महत्त्वपूर्ण सीख देता है: जब पारंपरिक अवसर सीमित हों, तब वैज्ञानिक जिज्ञासा और पहल अनुसंधान के नए रास्ते खोल सकती हैं।

वैज्ञानिक योगदान: भारतीय पक्षी-विज्ञान को व्यवस्थित स्वरूप देना

सलीम अली के सबसे बड़े योगदानों में से एक भारत में व्यवस्थित, क्षेत्र-आधारित पक्षी-विज्ञान अनुसंधान का विकास था।

उनके सर्वेक्षणों में जंगल, आर्द्रभूमियाँ, घास के मैदान, पर्वतीय क्षेत्र, तटीय पारिस्थितिकी तंत्र और अन्य विविध प्राकृतिक आवास शामिल थे। इन अध्ययनों में पक्षियों की प्रजातियों, उनके भौगोलिक वितरण और पारिस्थितिक संबंधों का दस्तावेजीकरण किया गया। इससे भारत के पक्षी जगत के अध्ययन के लिए कहीं अधिक मजबूत वैज्ञानिक आधार तैयार हुआ।[2,3]

वर्ष 1930 में उन्होंने बॉम्बे के निकट किहिम में बया (Ploceus philippinus) के प्रजनन व्यवहार पर एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय अध्ययन किया। यह भारत में पक्षियों के व्यवहार के शुरुआती व्यवस्थित अध्ययनों में से एक था। यह शोध संरक्षित नमूनों पर निर्भर रहने के बजाय जीवित पक्षियों को उनके प्राकृतिक परिवेश में अध्ययन करने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।[3]

उनके अनुसंधान ने पक्षियों के प्रवास, प्रजनन प्रतिरूप, भौगोलिक वितरण और आवास संबंधी प्राथमिकताओं के ज्ञान को भी समृद्ध किया।

पक्षी-विज्ञान को आम लोगों तक पहुँचाना

सलीम अली समझते थे कि वैज्ञानिक ज्ञान केवल अकादमिक संस्थानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

उनकी ऐतिहासिक पुस्तक The Book of Indian Birds पहली बार 1941 में प्रकाशित हुई और भारत में पक्षियों की पहचान के लिए सबसे प्रभावशाली मार्गदर्शिकाओं में से एक बन गई।[3] सरल और सुलभ भाषा में लिखी गई इस पुस्तक ने विद्यार्थियों, शौकिया प्रकृतिविदों, पक्षी-दर्शकों और शोधकर्ताओं को देश के पक्षियों को पहचानने तथा उनका अध्ययन करने में सहायता की।

अमेरिकी पक्षी-विज्ञानी एस. डिलन रिप्ली के साथ उनके सहयोग से बहुखंडीय ग्रंथ Handbook of the Birds of India and Pakistan तैयार हुआ। यह भारतीय उपमहाद्वीप के पक्षियों का अध्ययन करने वाले पक्षी-विज्ञानियों के लिए एक महत्त्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ बन गया।[3]

इन प्रकाशनों ने पेशेवर वैज्ञानिक अनुसंधान और प्राकृतिक इतिहास में जनभागीदारी के बीच की दूरी को कम करने में मदद की।

सलीम अली ने पक्षी-दर्शन को केवल एक सामान्य शौक बने रहने के बजाय सावधानीपूर्वक अवलोकन और वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण पर आधारित गतिविधि के रूप में विकसित करने में योगदान दिया।

पर्यावरण के स्वास्थ्य के संकेतक के रूप में पक्षी

सलीम अली का योगदान पक्षियों की पहचान और उनका दस्तावेजीकरण करने तक सीमित नहीं था। उनके कार्य ने पक्षियों को पारिस्थितिक तंत्र के महत्त्वपूर्ण घटकों के रूप में समझने की दृष्टि विकसित करने में सहायता की।

पक्षी अनेक आवश्यक पारिस्थितिक कार्य करते हैं। कुछ पक्षी बीजों का प्रसार करके वनों के पुनर्जनन में योगदान देते हैं; कुछ कीटों की संख्या नियंत्रित करते हैं, पौधों के परागण में सहायता करते हैं अथवा शिकारी और मृतभक्षी की भूमिका निभाते हैं। किसी क्षेत्र में पक्षियों की उपस्थिति, संख्या और वितरण उनके प्राकृतिक आवासों की स्थिति के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी भी दे सकते हैं।

पक्षियों की आबादी में होने वाले परिवर्तन आवासों के क्षरण, प्रदूषण, भोजन की उपलब्धता में बदलाव, कृषि के गहन विस्तार, बाहरी आक्रामक प्रजातियों या जलवायु संबंधी परिवर्तनों की ओर संकेत कर सकते हैं। हालाँकि, इन परिवर्तनों की व्याख्या सावधानीपूर्वक करनी चाहिए, क्योंकि अनेक पर्यावरणीय कारक एक साथ पक्षियों की आबादी को प्रभावित कर सकते हैं।

व्यवस्थित क्षेत्रीय अवलोकन पर सलीम अली के जोर ने भारतीय भू-दृश्यों में इन संबंधों को समझने की नींव तैयार करने में मदद की। उनका कार्य हमें याद दिलाता है कि किसी पक्षी का अध्ययन केवल उसका नाम जानने तक सीमित नहीं है; इसमें उस पारिस्थितिकी तंत्र को समझना भी शामिल है, जिसमें वह जीवित रहता है।[2,3]

पक्षी अनुसंधान से वन्यजीव संरक्षण तक

सलीम अली के सबसे महत्त्वपूर्ण योगदानों में से एक यह समझ थी कि पक्षियों का संरक्षण उनके प्राकृतिक आवासों के संरक्षण से अलग नहीं किया जा सकता।

आर्द्रभूमियाँ, वन, घास के मैदान, तटीय पारिस्थितिकी तंत्र और पर्वतीय क्षेत्र पक्षियों को प्रजनन स्थल, भोजन, आश्रय तथा प्रवास के दौरान ठहरने के स्थान उपलब्ध कराते हैं। इन आवासों का विनाश पूरे पारिस्थितिक समुदायों के लिए खतरा बन सकता है।

सलीम अली वन्यजीव संरक्षण के सक्रिय समर्थक बने और उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय मुद्दों पर हस्तक्षेप किया। उनके प्रयासों ने राजस्थान के भरतपुर स्थित केवलादेव घाना के संरक्षण तथा केरल की साइलेंट वैली को बचाने के अभियान में योगदान दिया। ये प्रयास दर्शाते हैं कि वैज्ञानिक ज्ञान को पर्यावरण संरक्षण के लिए जन-आंदोलन और नीतिगत पहल में किस प्रकार बदला जा सकता है।[1,3]

बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) के साथ उनका जुड़ाव विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण था। कई दशकों तक उन्होंने सोसाइटी की वैज्ञानिक गतिविधियों, क्षेत्रीय अनुसंधान और संरक्षण संबंधी पहलों को मजबूत बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके कार्य ने भारत में वन्यजीव संरक्षण के लिए अधिक सुदृढ़ वैज्ञानिक आधार तैयार करने में सहायता की।[2,3]

उस दौर में, जब पर्यावरण संरक्षण अभी व्यापक जनचिंता का विषय नहीं बना था, सलीम अली ने लोगों को यह समझाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई कि वन्यजीवों के अस्तित्व के लिए प्राकृतिक आवासों की रक्षा क्यों आवश्यक है।

सम्मान और स्थायी विरासत

पक्षी-विज्ञान और वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए सलीम अली को अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए।

उनके प्रमुख राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों में शामिल हैं:

  • पद्म भूषण (1958): विज्ञान और प्राकृतिक इतिहास के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए।

  • पद्म विभूषण (1976): राष्ट्र के प्रति उनके असाधारण योगदान की मान्यता में।

  • जे. पॉल गेटी वन्यजीव संरक्षण पुरस्कार (1975): वन्यजीव संरक्षण में उनके योगदान के लिए।[2,3]

वर्ष 1985 में उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया। यह वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में उनके ज्ञान और अनुभव के राष्ट्रीय महत्त्व को दर्शाता है।[1]

उनके योगदान के प्रति सबसे स्थायी सम्मानों में से एक उनके निधन के बाद स्थापित किया गया संस्थान है। भारत सरकार और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी ने वर्ष 1990 में कोयंबटूर में सलीम अली पक्षी-विज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केंद्र (Sálim Ali Centre for Ornithology and Natural History – SACON) की स्थापना की। इस संस्थान का उद्देश्य पक्षी-विज्ञान और प्रकृति संरक्षण के क्षेत्र में अनुसंधान, शिक्षा तथा विशेषज्ञता को आगे बढ़ाना था। यह उस दृष्टि को साकार करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था, जिसे स्वयं सलीम अली ने बढ़ावा दिया था।[5]

उनकी पुस्तकें, अनुसंधान और क्षेत्र-आधारित वैज्ञानिक दृष्टिकोण आज भी पक्षी-विज्ञानियों, विद्यार्थियों, पक्षी-दर्शकों और संरक्षणवादियों को प्रेरित करते हैं।

आज के समय में सलीम अली क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?

भारत की पक्षी विविधता को आज आवासों के विनाश, आर्द्रभूमियों के क्षरण, प्रदूषण, बुनियादी ढाँचे के विकास, बदलती कृषि पद्धतियों और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

इस जैव विविधता की रक्षा के लिए विश्वसनीय वैज्ञानिक जानकारी आवश्यक है। बार-बार किए जाने वाले क्षेत्रीय अवलोकन, प्रजातियों की सही पहचान, आबादी की निगरानी और प्राकृतिक आवासों का आकलन पर्यावरणीय परिवर्तनों को समझने तथा प्रभावी संरक्षण उपायों की योजना बनाने के लिए अनिवार्य हैं।

सलीम अली का जीवन वैज्ञानिक अनुशासन, जिज्ञासा और जनभागीदारी के संयोजन का महत्त्व दर्शाता है। उन्होंने लोगों को पक्षियों की दिखाई देने वाली सुंदरता से आगे बढ़कर उनके पारिस्थितिक महत्त्व को समझने के लिए प्रेरित किया।

उनका योगदान एक व्यापक सिद्धांत को भी रेखांकित करता है: वैज्ञानिक अनुसंधान तब अधिक सार्थक बनता है, जब वह समाज को पर्यावरणीय समस्याओं को पहचानने और प्रमाण-आधारित कदम उठाने में सहायता करता है।

एक ऐसा बालक, जो कभी एक अनजान गौरैया की पहचान जानना चाहता था, आगे चलकर पूरे देश को उसकी पक्षी-विविधता का महत्त्व समझाने में सफल हुआ। उन्होंने सामान्य नागरिकों के लिए पक्षियों का अवलोकन सुलभ बनाया, वैज्ञानिक पक्षी-विज्ञान को मजबूत किया और वन्यजीव संरक्षण को जनचेतना का विषय बनाने में योगदान दिया।

इसलिए सलीम अली की विरासत केवल वैज्ञानिक साहित्य या उनकी स्मृति में स्थापित संस्थानों तक सीमित नहीं है। जब भी कोई विद्यार्थी किसी पक्षी का अवलोकन करता है, कोई शोधकर्ता उसके आवास का दस्तावेजीकरण करता है, कोई नागरिक पक्षी सर्वेक्षण में भाग लेता है या कोई समुदाय आर्द्रभूमि की रक्षा के लिए कदम उठाता है, उनकी विरासत जीवित होती है।

उन्होंने भारत को केवल पक्षियों को देखना ही नहीं, बल्कि उनका वैज्ञानिक ढंग से अवलोकन करना, प्रकृति में उनकी भूमिका को समझना और उनके संरक्षण के प्रति अपनी जिम्मेदारी पहचानना सिखाया।

उनका जीवन युवा वैज्ञानिकों के लिए एक स्थायी संदेश देता है: महान वैज्ञानिक योगदान हमेशा अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं या महँगे उपकरणों से ही शुरू नहीं होते। कभी-कभी उनकी शुरुआत एक साधारण प्रश्न, जिज्ञासु मन और प्रमाण-आधारित उत्तर खोजने के दृढ़ संकल्प से होती है।

संदर्भ

  1. Sálim Ali Centre for Ornithology and Natural History (SACON). Dr. Sálim Ali Profile [Internet]. Coimbatore: SACON [cited 2026 Nov 3]. उपलब्ध: https://www.sacon.in/salim-ali-profile/

  2. Bombay Natural History Society (BNHS). Sálim Ali: Birdman of India. Hornbill. 2016 Jul-Sep [Internet]. उपलब्ध: https://www.bnhs.org/public/hornbill_pdf/1551516099.pdf

  3. Bombay Natural History Society (BNHS). BNHS Timeline [Internet]. Mumbai: BNHS [cited 2026 Nov 3]. उपलब्ध: https://www.bnhs.org/time-line

  4. Ali S. The Fall of a Sparrow. New Delhi: Oxford University Press; 1985.

  5. Ministry of Environment, Forest and Climate Change, Government of India. Sálim Ali Centre for Ornithology and Natural History [Internet]. उपलब्ध: https://wii.gov.in/index.php/sacon

 
 
 

टिप्पणियां

5 स्टार में से 0 रेटिंग दी गई।
अभी तक कोई रेटिंग नहीं

रेटिंग जोड़ें
bottom of page